Sunday, March 7, 2010

नजरिया

नजरिया क्या है ? एक शिक्षक ने जब ये सवाल अपने शिष्यों ये किया और मिले ढेर सारे जवाब ,शिक्षक थोडा सा मुस्कुराया और बड़े सहज भाव से कहा -"बेटा ! यही है नजरिया मैंने एक सवाल तुमसे किया और तुम लोगो ने ढेर सारे उत्तर दिया , सबने अपने हिसाब से , बस यही है नजरिया "
कितनी आसानी से उस शिक्षक ने नजरिये की परिभाषा अपने बच्चों को सिखा दी पर आज लोग इस भीड़ भरी दुनिया में परेशान हैं तो वजह है सिर्फ -"नजरिया " हर किसी को बड़ा बनना है भीड़ में अपनी पहचान बनानी है , मैं ये कतई नहीं कहता की मुझे अपनी पहचान नहीं बनानी ,बनानी है ,पर थोडा अंतर है शायद अभी ये कहना छोटे मुह बड़ी बात होगी की कैसे मैं खुस हूँ मैं जैसा हूँ ,पर मैं भी इन्सान हूँ जब कभी परेशान होता हूँ तो सिर्फ इस नजरिये की वजह से , जाने क्यों मैं भी दोड़ने लगता हूँ सबके साथ पर हाँ छोटी- छोटी बातों से बहुत कुछ सीखना मुझे विरासत में मिला है आज मैंने एक ऐसे आदमी को देखा जिसके पैर नहीं थे और वो बंदा खुस था ,एक आदमी ने उससे कुछ पूछा तो उसने मस्त होकर जवाब दिया सामने वाला भी हसने लगा ,वो अपंग आदमी एक भिखारी था मैंने सोचा उसने अपनी जिन्दगी में कभी नहीं चाहा होगा की वो भीक मांगे , क्या उसे अपने अपंग होना का दुःख नहीं होगा पर मैंने जाना उसका नजरिया . "कितने लोग हैं जिनके हाँथ पैर दोनों नहीं है ,मेरे तो कमसे कम हाँथ है मैं घिसट के ही सही चल पा रहा हूँ पर उनका क्या वो बेचारे तो एक ही जगह पर जिन्दगी काट देते हैं ,कहीं जाना हो तो दूसरों पे निर्भर रहते हैं मैं उनसे तो बेहतर हूँ "
उस भिखारी ने एक सीख दे दी ,वो चाहता तो हम जैसे लोग जिनके पास भगवन का दिया सब कुछ है को देख के दुखी हो सकता था पर उसने चाहा वो रास्ता जिसमे सुखी रह सके ,ये है नजरिया
और हमारी हालत कुछ ऐसी है की १० की चाह मैं हम दोड़ते हैं जब हमें १० मिल जाते हैं तो हम १०० की चाहत में दोड़ने लगते हैं ,जब १०० मिल जाते हैं तो १००० की चाहत में , इस तरह हम पूरी जिन्दगी दोड़ते रहते है कभी समय ही नहीं निकल पाते ये देखने के लिए की हमारे पास क्या है "ज्यादा हमारी फितरत है " हम हमेशा भागते रहते है कुछ हासिल करने के लिए पर उसे देखते ही नहीं जो हमने हासिल किया है ,हम दुखी हैं इसलिए नहीं क्यूंकि हमारे पास फलानी वस्तु नहीं हम दुखी हैं क्यूंकि वो किसी दुसरे के पास है ,पर हम खुस रह सकते हैं ये सोच के की कितनी सारी चीज़ें हैं जो हमारे पास हैं पर दूसरों के पास नहीं , बस यही है "najariya"
DEDICATED TO MY FATHER
who teach me lesson of happiness

Tuesday, February 23, 2010

दूरियां

सुबह के सात बजे का समय रहा होगा । महाशय रविकिसन जी अपने घर के आँगन में बैठे समाचार पत्र के पन्ने पलटते हुए चाय की चुस्की ले रहे थे । अनायास ही एक लेख पर नजर चली गयी ,लेख का शीर्षक था "रिश्तों के बीच बढती दुरियाँ" । इस लेख में कुछ बाप - बेटों के उदाहरण दिए गए थे और शीर्षक को सपष्ट किया गया था । एक उदहारण पढ़ कर रविकिसन जी अपने भूतकाल में चले गए । --"रवि जरा इधर आओ " ,"जी हाँ बाबूजी " ये आवाज़ थी रविकिसन जी के पिताजी की -"सुनो कल तुम गाँव चले जाना और नोकारों को बुआई के लिए बीज दे आना ,कल तुम सुबह ही निकल जाना क्योंकि पैदल जाना होगा ,कल साइकिल राजेश ले जाएगा ,उसे कॉलेज जाना है । "
"जी हाँ बाबूजी "- रविकिसन जी ने उत्तर दिया ।
दुसरे दिन सुबह सुबह रविकिसन जी बोरी ले कर निकल गए । शाम को थक हारकर जब घर लौटे तो पता चला की बड़े भैया कॉलेज गए ही नहीं । गुस्सा तो बहुत आया पर शांत ही रहे । आखिर उनकी इतनी हिम्मत कहा जो पिताजी को कुछ बोल सकें । रात को जब सब बैठकर खाना खा रहे थे की तभी पिताजी की आवाज़ सुनाई दी -"राजेश तुम्हे आज कॉलेज जाना था न ! तुम गए नहीं । "
प्रतिउत्तर में बड़े भैया ने कहा -"हाँ पिताजी ,पर आज कोई नहीं आने वाला था,मुझे बाद में याद आया । "
पिताजी -"इस बात को तुम पहले ही बता देते तो अच्छा होता ,रवि आज गाँव तक बोरी लेकर पैदल ही गया था ."
उत्तर में भैया ने कुछ भी नहीं बोला । असल में पिताजी थोड़े स्वाभाव से गुस्सेल एवं काफी अनुसासन प्रिय ,मान-मर्यादाओ को मानने वाले हैं ।
बात वही ख़तम हुई ,सबने खाना खाया । यहाँ-वहां की बातें हुई और फिर सब अपने -अपने कमरे में जाकर सो गए । रवि किसान जी भी काफी थक चुके थे इसलिए जल्दी ही नींद लग गयी ।
करीबन आधी रात को रविकिसन जी की नींद अचानक खुली तो देखा की पिताजी उनके पैर दबा रहे हैं । असल में गाँव तक पैदल जाने के कारण उनके पैर में काफी दर्द हो रहा था और वो नींद में पैर पटक रहे थे उसी आवाज़ को सुनकर पिताजी उनके कमरे में आ गए । रविकिसन जी ने तुरंत पिताजी को हटाया ,अपने पैर खींच लिए ,परन्तु उन्होंने फिर उसी अनुशासन से रविकिसन जी को लिटा दिया और पैर दबाने लगे और कहा -"बेटा ! मुझे नहीं मालूम था की राजेश आज कॉलेज नहीं जाएगा ,बस इसलिए ....."
रविकिसन जी ने उन्हें वहीँ पर रोककर उनके पैर पकड़ लिए और कहा -"मुझे मालूम है पिताजी , आपको कुछ कहने की जरुरत नहीं ।" और बस रविकिसन जी की आँखों से आंसू आने लगे । पिताजी ने उन्हें शांत कराया और हाँथ फेरते हुए सुला दिया ।
तभी अचानक रविकिसन जी की भूतकाल की निद्रा टूटी और कानो में आवाज़ आई अपने बेटे मृदुल की -"पापा आज हमें कहाँ चलना है आपको याद है न ॥"
रविकिसन जी ने कहा -"कहाँ ?"
मृदुल ने कहा - " पापा आप फिर भल गए ! हम आज जू जाने वाले थे न "
रविकिसन जी ने कहा -"अरे हाँ । "
फिर रविकिसन जी को याद आया की अभी कल की ही तो बात है मृदुल ने अपने सारे दोस्तों को को मना कर दिया था जू जाने के लिए । वे सरे वहां मौज मस्ती के लिए जा रहे थे ,उसने कहा की मैं अपने पापा के साथ जाऊंगा ।

तभी रविकिसन जी को लेख लिखने वाले पर हंसी आ गयी और उन्होंने पन्ने पलटा दिए ....

Saturday, December 5, 2009

ख्वाब

अक्सर कुछ चहेरे मुझे ख्वाब मैं आया करते हैं ,
न जाने क्यों ,बे-वजह ही मुझे आजमाया करते हैं ,
कभी किसी बूढ़े की आंखों में ,
कभी किसी डरे हुए बच्चे की साँसों में ,
वो मुझे कुछ समझाया करते हैं ,
अक्सर कुछ ..............

दिन ढलते हैं ,
मौसम बदलते हैं ,
पर ये ख्वाब नही बदलते ,
यूँ ही कभी रस्ते पर चलते हुए ,
किसी भिकारी के चहेरे पर , ये मुझे अपना संदेशा सुनाया करते हैं ,
अक्सर कुछ .........

मैं नसमझ न समझा , अब तक इनकी जबानी ,
इशारों में इनके , तजुर्बों की कहानी ,
न समझा की ये मुझे क्या समझाया करते हैं ,
अक्सर कुछ .........

इक रात फ़िर वही सपना जब मुझे आया ,
तो मैंने अपना चेहरा ही उस चहेरे मैं पाया ,
वो तो बस 'न भुलाना अपने आपको' ये सिखाया करता था ,
अब मैं समझा की अपना चेहरा ही मुझे ख्वाब मैं आया करता था ॥

Friday, December 4, 2009

अंतर्द्वंद

जिन्दगी बड़ी ही रोचक कहानी है ,चाहे वो किसी की भी हो मेरी या किसी और की हर नया दिन नया पन्ना लगता है ,और हमेशा अगला पन्ना जानने की इच्छा बनी रहती है जब भी जिन्दगी में दो रास्ते जाते हैं ,तो सामान्य आदमी भटक ही जाता है , जो चीज उन्हें भटकने से रोकती है वो है उनका "मूल्यांकन", वो कितना सच बोलते हैं अपने आपसे आदमी दूसरों से झूट बोल सकता है पर अपने आप से नही ,और जिसने अपने आप से झूट बोलना सीख लिया उसका भटकना तो निश्चित है
पिछले कुछ दिनों से जिन्दगी इन्ही तरह के दोराहों से गुजर रही है दिल किसी और को सही कहता है और दिमाग किसी और को पर मैं जान चुका हूँ की दिल सही है या दिमाग ये दिमाग मेरा है और इसने जो समाज में होते देखा है ,वही करना चाहता है ,क्योंकि बदले की भावना इसी दिमाग की उपज है जिसने मेरे साथ जैसा किया उसके साथ वैसा ही करूँ ,चाहे वो अच्छा हो या ग़लत ऐसा नही है की मेरा दिमाग सिर्फ़ ग़लत करने को कहता है ,जिसने मेरे साथ अच्छा किया ,उसके साथ उससे कहीं अच्छा करने को भी यही कहता है
पर ये दिल बड़ा अजीब है ,और सच मानिये कहीं कहीं इस दिल में आपके माँ-बाप संस्कार समाये हुए हैं ,जो आपको एहसास दिलाते रहते हैं की क्या सही है और क्या नही और यहीं से शुरू होता है अंतर्द्वंद दिल और दिमाग का पर सच तो यही है की इस दिल ने कभी झूठ नही बोला ये दिल ही है जो ये कहता है की किसी और के लिए तुम कैसे बदल सकते हो कोई तुम्हारे साथ कुछ भी करे , तुम हमेशा दूसरों के साथ अच्छा करना अगर दूसरों ने तुम्हे बदल दिया तो इसका मतलब है की वो ज्यादा प्रवाभी हैं ,पर क्या ऐसा है ?

तुम इतने प्रवाभी बनो की तुम दूसरों को बदल सको दुसरे तुम्हे नही ......................


Sunday, November 29, 2009

"सब से बड़ा complement "

इसे मैं सिर्फ़ इसलिए लिखना चाहता था , जिससे आने वाले कल से जब मैं अपने आप को मुड़ के देखूँ तो कुछ महसूस कर सकूँ । अक्सर लोग बड़े होते-होते इस दुनिया के हिसाब से ढलने लगते हैं ,अच्छे - बुरे से उन्हें कोई मतलब नही होता ।
खैर ये सब छोडिये मैं आपको उसकी कहानी बताने जा रहा हूँ , जो मेरे लिए आज तक का सबसे बड़ा कोम्प्लिमेंट है । मेरी coaching उस समय सुबह ६ बजे हुआ करती थी । वही coaching के पास एक चाय की दुकान थी सामान्यतः मैं वही पर चाय पिया करता था । उस दिन वो चाय की दुकान बंद थी और मैं थोड़ा जल्दी भी पहुँच गया था , तो मैंने सोचा क्यों न कुछ दूरी पर एक और चाय की दुकान है उस पर जाया जाए । मैं उसकी तरफ़ बढ चला । वो एक बुजुर्ग वृद्ध था जो की सुबह ५ बजे ही अपनी दुकान खोल लिया करता था । मैं पहुँचा चाय पी ,पर्स देखा तो सिर्फ़ १००-१०० क दो नोट थे , अब चाय थी ३ रुपये की उस वृद्ध आदमी के पास इतनी change नही थी उस बेचारे की बोहनी तो मैंने अपनी चाय से ख़राब कर ही दी ,ये उसके चहेरे से साफ़ दिखाई दे रहा था ,अखी क्या करता कह दिया बाद में दे देना । मैंने भी हाँ कह कर अपनी राह ली । सोचता रहा मुझे एक बार पैसे देख लेने थे , फ़िर सोचा कोई बात नही कल दे दूंगा ।
दुसरे दिन फ़िर मैं coaching गया , पर भूल गया । मैं ये बताना तो भूल ही गया मेरी coaching हफ्ते में दो दिन ही रहती है । अब एक हफ्ते बाद की बात हो गई । इस तरह मैं दुसरे हफ्ते भी गया ,और भूलता रहा ।
शायद आप ये सोचें की मेरी नियत ही न रही हो पैसे देने की ,और सोचना वाजिब भी है ,हो सकता है उस वृद्ध आदमी ने भी यही सोचा हो ,पर ये तो मैं ही जनता हूँ ,की ऐसा नही था ,बस मैं भूलता रहा ।
उस दिन न जाने मुझे कैसे याद रहा की आज मुझे उसके पैसे देने हैं ,क्योंकि सच में कहीं न कहीं मुझे ये बात बार - बार याद आती थी । मैं उसकी दुकान पहुँचा ,मैंने पूंछा -" दादा चाय कितने की है" ,असल मैं मुझे ये याद भी नही था की वो ४ रुपये में देता है या ३ रुपये मैं .उसने जवाब दिया -"३ रुपये की" ,और बस चाय भरने लगा । मैं तो चाय पी चुका था और बस पैसे देने ही गया था । पर मैं उसे मना नही कर पाया और चाय पी कर उसे मैंने ६ रुपये दिए और कहा -"दादा मैं एक चाय पहले पी गया था मेरे पास चिल्हर नही थी इसलिए दे नही पाया था ।"
मुझे नही पता की मैंने कोन सा बड़ा काम कर दिया , उसकी आँखों में कुछ अलग बात थी , उसने मुझसे पैसे लिए और कहा - " बेटा मुझे तो याद भी नही की तुम कब पी गए थे ,पर हाँ आज जो तुमने किया है वो कोई मामूली बात नही है ,कितने यहाँ ऐसे ही आते हैं जो केवल चाय पी के चिल्हर न होने का बहाना कर के चले जाते हैं ,पर तुम जैसे कुछ लोगो के कारन हमारा विस्वास आज भी बना हुआ है इस दुनिया में ......."
ना जाने उसने मुझसे क्या कह दिया था पर हाँ बहुत अच्छा लग रहा था ,ऐसा कुछ महसूस हो रहा था की मैंने कोई अच्छा काम किया है ...पर मैंने तो सिर्फ़ अपनी उधारी चुकाई थी ,जो मुझे मेरे मम्मी पापा ने सिखाया है कि बेइमानी कि कोई चीज़ कभी काम नही आती हमेशा इमानदारी से जिन्दगी जीना , और मैंने वही किया बस ।
पर उस वृद्ध कि आँखे मुझसे बहुत कुछ कह गई , बस अब यही चाहत है कि ये तो ३ रुपये कि बात थी ,पर जिन्दगी में यही चाहूँगा कि कभी जब लाखों कि बात हो तब भी में उस वृद्ध कि आँखे याद कर सकूँ ,वो मुझे अच्छा रास्ता ही चुनने में मदद करेंगी ........

आज में बहुत खुस हूँ ...........[:)]

Saturday, November 7, 2009

" तुम्हारे लिए "


हम उनके मुस्कुराने का इंतज़ार करते रहे
जिन्हें मुस्कुराना न था ।
खता उनकी भी क्या कहें
दिल उनका तो ग़मों का खजाना था ।।


तेरी यादों को यादों में सजोंकर ,
मैं बस यादों में ही जीता रहा ।
गिरते हुए आंसुओं को मोती समझा मैंने ,
और मोतियों की चाहत में रोता रहा ।।

3
वो मेरी राहों में काटें बिछाते रहे ,
और हम नदान उनके तरफ़ कदम बढाते रहे ।
वो मेरे जख्मों को देख खुस होते रहे ,
और हम उनकी हँसी में अपना लहू बहाते रहे ।।

4
इन दोस्तों की महफ़िल में ,तुम कुछ अजीब से लगे ,
दूर खढे रहकर भी दिल के कुछ करीब से लगे
अब तो बस दुआ है यही .....
हर किसी को मिले तुझसा दोस्त ,
मुझे कोई बदनसीब सा लगे ।।

Wednesday, November 4, 2009

"प्यार"

प्यार हमारी जिन्दगी में क्या महत्तव रखता है ? यह सवाल आज मेरे मन में जाने क्यों उठा ,और उसका जवाब भी आज जब मैने अपने बारे में सोचा की प्यार मेरी जिन्दगी में क्या है तो जाना की इस पुरी जिन्दगी में प्यार ही तो सब कुछ है एक बच्चा जब इस दुनिया में जन्म लेता है, तो वह रोता है , आँसु बहाता है ,वो प्यार भरी आँखे ही उसके जीवन का कारण होती हैं , जो वो अपने चारो तरफ़ देखता है ये आँख उन माँ-बाप की है जो उसी समय से उसके भविष्य के लिए सपने बुनने लगती हैं ,ये आँख उन दादा-दादी की हैं जो उस बच्चे में अपना बचपन ढूंढने लगती हैं प्यार ही वो चीज़ है जिससे ये दुनिया चल रही है प्यार की खोज में हम अपना जीवन निकल देते हैं लेकिन उस प्यार को नही पहचान पाते जो हमारे चरों तरफ़ व्याप्त है

पर जहाँ तक आज की बात है प्यार के मायने बदल गए हैं ,लोग रुपये -पैसे में प्यार को तोलने लगे हैं ये ग़लत है पर सामयिक स्थितियाँ इसके लिए जिम्मेवार हैं क्या जो लोग गरीब होते हैं वो अपने बच्चों से प्यार नही करते ,करते हैं पर हाँ वे उसे वे सुख- सुविधाएँ नही दे पते जो वो उसे देना चाहते हैं

आज जब दोस्तों यारों बीच जब प्यार की बात होती है ,तो बस लोगो का दिमाग प्यार की एक अलग ही परिभाषा लिखता है उनका मानना है की प्यार तो बस एक लड़का -लड़की के बीच में ही हो सकता है ,पर ये ग़लत है आज जो वो दोस्त साथ बैठे हैं इसकी वजह भी कहीं कहीं प्यार ही है में ये भी नही कहता की एक लड़का लड़की के बीच प्यार नही हो सकता ,हो सकता है पर "प्यार" शब्द सुनते ही हम जो सोचते हैं वो सही नही है प्यार जिन्दगी का सबसे पवित्र रिश्ता है ,क्योंकि ये हर रिश्ते मैं होता है प्यार में हमेशा खुसी ही मिले ये भी जरुरी नही ,क्योंकि ये भी जरुरी नही की आप जिससे प्यार करे वो भी आप से प्यार करे प्यार में कोई लेनदेन भी नही , की आपने ज्यादा प्यार किया और सामने वाले ने आपको कम प्यार किया परोक्ष रूप में देखा जाए तो प्यार का दूसरा नाम त्याग है क्योंकि बिना प्यार के आदमी त्याग नही कर सकता


तो इन सब बातों से हम कह सकते हैं , की प्यार में हँसी ही मिले ये जरुरी नही प्यार में रोना भी पड़ता है ,पर हाँ उन आंसुयों का मजा ही कुछ और होता है जो प्यार के लिए गिरें .....................

ये क्या क्या हो रहा है

ये क्या क्या हो रहा है........  इंसान का इंसान से भरोसा खो रहा है, जहाँ देखो, हर तरफ बस ऑंसू ही आँसू हैं, फिर भी लोगों का ईमान  सो रहा है।  ...