Saturday, November 7, 2009

" तुम्हारे लिए "


हम उनके मुस्कुराने का इंतज़ार करते रहे
जिन्हें मुस्कुराना न था ।
खता उनकी भी क्या कहें
दिल उनका तो ग़मों का खजाना था ।।


तेरी यादों को यादों में सजोंकर ,
मैं बस यादों में ही जीता रहा ।
गिरते हुए आंसुओं को मोती समझा मैंने ,
और मोतियों की चाहत में रोता रहा ।।

3
वो मेरी राहों में काटें बिछाते रहे ,
और हम नदान उनके तरफ़ कदम बढाते रहे ।
वो मेरे जख्मों को देख खुस होते रहे ,
और हम उनकी हँसी में अपना लहू बहाते रहे ।।

4
इन दोस्तों की महफ़िल में ,तुम कुछ अजीब से लगे ,
दूर खढे रहकर भी दिल के कुछ करीब से लगे
अब तो बस दुआ है यही .....
हर किसी को मिले तुझसा दोस्त ,
मुझे कोई बदनसीब सा लगे ।।

Wednesday, November 4, 2009

"प्यार"

प्यार हमारी जिन्दगी में क्या महत्तव रखता है ? यह सवाल आज मेरे मन में जाने क्यों उठा ,और उसका जवाब भी आज जब मैने अपने बारे में सोचा की प्यार मेरी जिन्दगी में क्या है तो जाना की इस पुरी जिन्दगी में प्यार ही तो सब कुछ है एक बच्चा जब इस दुनिया में जन्म लेता है, तो वह रोता है , आँसु बहाता है ,वो प्यार भरी आँखे ही उसके जीवन का कारण होती हैं , जो वो अपने चारो तरफ़ देखता है ये आँख उन माँ-बाप की है जो उसी समय से उसके भविष्य के लिए सपने बुनने लगती हैं ,ये आँख उन दादा-दादी की हैं जो उस बच्चे में अपना बचपन ढूंढने लगती हैं प्यार ही वो चीज़ है जिससे ये दुनिया चल रही है प्यार की खोज में हम अपना जीवन निकल देते हैं लेकिन उस प्यार को नही पहचान पाते जो हमारे चरों तरफ़ व्याप्त है

पर जहाँ तक आज की बात है प्यार के मायने बदल गए हैं ,लोग रुपये -पैसे में प्यार को तोलने लगे हैं ये ग़लत है पर सामयिक स्थितियाँ इसके लिए जिम्मेवार हैं क्या जो लोग गरीब होते हैं वो अपने बच्चों से प्यार नही करते ,करते हैं पर हाँ वे उसे वे सुख- सुविधाएँ नही दे पते जो वो उसे देना चाहते हैं

आज जब दोस्तों यारों बीच जब प्यार की बात होती है ,तो बस लोगो का दिमाग प्यार की एक अलग ही परिभाषा लिखता है उनका मानना है की प्यार तो बस एक लड़का -लड़की के बीच में ही हो सकता है ,पर ये ग़लत है आज जो वो दोस्त साथ बैठे हैं इसकी वजह भी कहीं कहीं प्यार ही है में ये भी नही कहता की एक लड़का लड़की के बीच प्यार नही हो सकता ,हो सकता है पर "प्यार" शब्द सुनते ही हम जो सोचते हैं वो सही नही है प्यार जिन्दगी का सबसे पवित्र रिश्ता है ,क्योंकि ये हर रिश्ते मैं होता है प्यार में हमेशा खुसी ही मिले ये भी जरुरी नही ,क्योंकि ये भी जरुरी नही की आप जिससे प्यार करे वो भी आप से प्यार करे प्यार में कोई लेनदेन भी नही , की आपने ज्यादा प्यार किया और सामने वाले ने आपको कम प्यार किया परोक्ष रूप में देखा जाए तो प्यार का दूसरा नाम त्याग है क्योंकि बिना प्यार के आदमी त्याग नही कर सकता


तो इन सब बातों से हम कह सकते हैं , की प्यार में हँसी ही मिले ये जरुरी नही प्यार में रोना भी पड़ता है ,पर हाँ उन आंसुयों का मजा ही कुछ और होता है जो प्यार के लिए गिरें .....................

Tuesday, September 1, 2009

नारी


आँखे झुकाना इनकी फितरत नही , मज़बूरी है ।

सपने
तो हैं इनके भी आँसमा छूने के ,पर समझोता जरुरी है ।।

हाँ ये कुछ और नही , एक लड़की की कहानी है ।

जिसके दिल मैं दर्द ,और आँखों मे पानी है । ।

लब्ज़ इनके होठों से भी ,अमादा है गिरने को

पर
पीढियों से कमजोर इनकी आत्मा ,मजबूर है डरने को । ।

चाहत है इनकी भी स्वछंद आँसमा में विचरण की

पर
अँधेरा ही हुआ इनके जीवन में ,जब भी उम्मीद दिखी एक किरण की । ।

अब तो ये इक्कीसवी सदी है

पर
फ़िर भी अन्ततः इनके जीवन में निरासा ही बदी है । ।

कितना भी ये समाज बड़ी बड़ी बातें कर ले

पर
फ़िर भी इनकी जिन्दगी तो अधूरी है । ।

आँखे झुकाना इनकी फितरत नही मज़बूरी है.............

Wednesday, December 17, 2008

इंतजार..........

आंखों से आँखें मिलाओ तो जरा ,
फासले बहुत हैं ,इन्हे कुछ घटाओ तो जरा ,
हम तो आगे बढ ही चुके हैं ,
पास तुम भी आओ तो जरा ,
आंखों सेआंखों से आँखें....... आँखे मिलाओ तो जर

कितना ही अरसा इंतजार में गुजरा ,
लबों ने भी बस तुम्हे ही पुकारा ,
हाल-ऐ-दिल अपना तुम भी सुनाओ तो जरा ,
आंखों सेआंखों से आँखें आँखें मिलाओ तो जरा .....................

ना जाने तुम रूठे हो क्यों ,
ना जाने तुम्हे डर है क्या ,
दिल में है क्या बताओ तो जरा ,
आंखों से आँखेंआंखों से आँखें मिलाओ तो जरा ..................

ख़वाहिश यही है की तुम्हे हम समझा तो सकेंगे ,
दुश्मन नही दोस्त बना तो सकेंगे ,
अंजाम क्या होगा ,ऐ-खुदा बताओ तो जरा ,
आंखों से आँखें मिलाओआंखों से आँखें तो जरा ...................

पीयूष वाजपेयी

Saturday, October 18, 2008

"मिलन"


मिलन
डूबते हुए सूरज को देख दिल घबराया सा ,
रोशनी गई दूर ,अँधेरा पास आया सा ।
छितिज में अंधेरे और प्रकाश का हो रहा था मिलन ,
कुछ अँधेरा आगे बढ़ा ही की मचलने लगा प्रकाश का मन ।
देखते ही देखते प्रकाश ने अंधेरे का हाथ छोड़ दिया ,
बढता हुआ आगे अपना रास्ता मोड़ दिया ।
रात भर के लिए अंधेरा ,फ़िर हो गया अकेला ,
चारों तरफ़ दिखाई दे रहा था खामोसी का मेला ।
अब अंधेरे को है फ़िर उस सुबह का इन्तजार ,
जब प्रकाश से होगा उसका मिलन फ़िर एक बार ।
पल दो पल के ये मिलन तो हो रहें हैं सदियों से ,
मिलन के इन्तजार में क्या होता है उनका हाल
पूंछो इन पहाडो और इन नदियों से...
पूंछो इन पहाडो और इन नदियों से...
पीयूष वाजपेयी

"बचपन की यादें "

किसी के भी जीवन में यादों का बहुत बड़ा स्थान होता है , और उसमें भी बचपन की यादें ....,
वे तो भुलाये नही भूलतीं हैं । ये वो यादें हैं जिनमे हमने जीवन का असली मजा लिया है । आज हम बड़े हो गए हैं और मैं शायद मेरे जैसे कुछ और भी अपना मुकाम पाने के लिए ,घर के बड़े -बुजुर्गों का सपना पूरा करने के लिए अपने घर से दूर हो गए हैं .... तो ऐसे समय मैं साथ हैं तो बचपन की वो हसीन यादें.....

आज भी मुझे याद आता है अपना वो स्कूल जिसमें मैंने से केजी-१ से ८-वीं तक की पढ़ाई पूरी की । याद आता है उन सहपाठियों का चेहरा जिनके साथ बचपन के अच्छे -बुरे लम्हे बिताये ,याद आती है उन गुरुजनों की जिन्होंने मुझे आज इस स्थान में पहुंचाया । छोटी -छोटी बातों पर ठहाके लगाकर हँसना ,निष्कपट हर बात कह देना ,दोस्तों के गम में दुखी होना और उनकी खुसी में सरीक होना ,छोटी -छोटी बातों पर झगड़ना और बड़े-बड़े झगडों के बाद फ़िर मिल जाना ,लंच होते ही टिफिन खोलकर बैठ जाना और मिल बाँट कर फ़िर खाना । स्कूल से लोटते ही मम्मी -पापा का वो प्यार भरा दुलार ,वो सिर में हाथ फेरना ,होमवर्क कराना ,आज भी याद आती है वो निशचिंत नींद जो मम्मी -पापा के साए में ली थी ।

यादें आँखों में चमक लेकर भी आती हैं और आँशु भी पर हाँ उन आँशुओं का मजा ही कुछ और होता है । वे आँशु साक्षी हैं इस बात के की हम अभी भी अपनी यादों के आधार से जुड़े हैं ,क्योंकि जिसने अपनी यादें गवां दी उसने अपना बचपन गवां दिया और जिसके पास बचपन ही नही उसके पास जीवन ही नही ............

पीयूष वाजपेयी

Thursday, October 16, 2008

यादें



जिन्दगी आज मुझे है किस मोड़ मैं ले आई,


जहां मैं हूँ और है मेरी तनहाई ।


दूर -दूर तक बस दुःख की घटा नजर आती है ,


आँखों से अश्को की धरा बह ही जाती है ।


याद आते हैं वे गुजरे हुए दिन ,


जब हम पल भी न गुजारा करते थे यारों के बिन ।


याद आती हैं ,वे गलियां जिनमे बीता है बचपन ,


आज हम तो यहाँ है ,पर वहीं है हमारा मन ।


जिन्दगी क्यों ऐसे रूप लेकर आती है ,


दो पल की खुसी देकर जीवन भर सताती है ।


सिर पर माँ -बाप का रखा हाँथ नजर आता है ,


याद कर के ही ये दिल तड़पा जाता है ।


याद आती हैं जीवन की वो रस्में ,


याद आती हैं दोस्ती की वो क़समें ।


ये दिल तो बस ग़मों को पीता है ,


याद करके ही ये दिल जीता है ...... ।




पीयूष वाजपेयी

ये क्या क्या हो रहा है

ये क्या क्या हो रहा है........  इंसान का इंसान से भरोसा खो रहा है, जहाँ देखो, हर तरफ बस ऑंसू ही आँसू हैं, फिर भी लोगों का ईमान  सो रहा है।  ...